सच ये है..
सच ये है, बेकार हमें ग़म होता है..
जो चाहा था दुनिया में, कम होता है..!!
गैरों को कब फुरसत है दुःख देने की ..
जब होता है कोई हमदम होता है..!!
ज़हन की शाखों पर अशार आ जाते हैं..
जब तेरी यादों का मौसम होता है..!!
ज़ख्म तो हमने इन आँखों से देखे हैं..
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है..!!
जो चाहा था दुनिया में, कम होता है..!!
गैरों को कब फुरसत है दुःख देने की ..
जब होता है कोई हमदम होता है..!!
ज़हन की शाखों पर अशार आ जाते हैं..
जब तेरी यादों का मौसम होता है..!!
ज़ख्म तो हमने इन आँखों से देखे हैं..
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है..!!


3 Comments:
अच्छी तुक बन्दी है हिन्दी में और भी लिखिये।
याद दिला दी तुमने... मैं तुरन्त ये गज़ल सुनता हूँ :-) कैसे हो?
@Jeet: Badhiya hee hoon.. but life mein kaafi busy busy ho raha hai!
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